Seven habits that kill the creativity.

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

image

Thank you….

nit

Advertisements

Indian laws.

छुट्टी के वेतन पर नियम-कानून समझें

हाल ही में एक आदमी ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। वो पिछले 15 साल से कंपनी में काम कर रहा था। वो रिटायर नहीं हुआ था और न ही उसने वीआरएस लिया था। उसे दूसरी कंपनी से बेहतर ऑफर मिला और उसने इस्तीफा दे दिया। लंबे अरसे तक एक ही कंपनी में काम करने के कारण उसे रिटायरमेंट बेनिफिट भी बहुत अच्छा मिला। उसे उसकी बची हुई छुट्टियों का वेतन भी दिया गया। समस्या तब खड़ी हुई जब उसकी पुरानी कंपनी ने छुट्टियों के वेतन का टैक्स (टीडीएस) भी काट लिया। इनकम टैक्स एक्ट में भी एक सीमा तक ही छुट्टियों के वेतन पर टैक्स मिलती है। सामान्य तौर पर कंपनियां इस टैक्स में छूट उन्हीं कर्मचारियों को देती हैं जो रिटायरमेंट के साथ कंपनी छोड़ते हैं। कंपनियां उन कर्मचारियों को छूट देने से बचती हैं जो रिटायरमेंट से पहले कंपनी छोड़ देते हैं।

कैसे बनता है छुट्टियों का वेतन?
अगर कोई कर्मचारी कंपनी नियमों के मुताबिक साल भर में मिलने वाली पूरी छुट्टियां नहीं लेता है तो उसकी बची हुई छुट्टियां बेकार चली जाती हैं। इसके अलावा हो सकता है कि कंपनी इन बची हुई छुट्टियों के बदले पैसे दे दे या उन्हें इकट्ठा करके बाद में आपको फायदा दे दिया जाए। कर्मचारी अपने सर्विस पीरियड के दौरान इकट्ठी की गई इन छुट्टियों का इस्तेमाल कभी भी कर सकता है। इसके अलावा इन छुट्टियों के बदले कर्मचारी रिटायरमेंट या नौकरी छोड़ते समय पैसे भी ले सकता है। इकट्ठी की गई छुट्टियों के बदले ली गई धनराशि ही त्नलीव इनकैशमेंटत्न होती है। सर्विस पीरियड के दौरान छुट्टियों के एवज में मिलने वाले वेतन पर टैक्स लगता है। ये टैक्स सरकारी और निजी संस्थान दोनों में ही काम करने वाले कर्मचारियों पर लगता है।

क्या हैं नियम?
इसके उलट टर्मिनेशन पर मिलने वाले वेतन पर लगने वाले टैक्स के लिए अलग प्रावधान होते हैं। सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाली त्नलीव इनकैशमेंटत्न पूरी तरह से टैक्स फ्री होता है। निजी संस्थान में काम करने वाले कर्मचारियों को छुट्टियों के बदले मिलने वाले वेतन पर टैक्स में आंशिक छूट मिलती है। निजी कर्मचारियों को 10 महीने तक के औसत वेतन पर टैक्स में छूट मिलती है। इसके अलावा छुट्टियों के बदले मिलने वाला वेतन 3 लाख रुपये या उससे कम होने पर भी छूट का प्रावधान है। इसके साथ ही रिटायरमेंट के समय छुट्टियों के बदले मिलने वाले वेतन पर पूरी तरह से टैक्स छूट मिलती है।

क्या कहता है कानून?
अनुच्छेद 10 (10एए) में ऑन रिटायरमेंट या अदरवाइज शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसमें गौर करने लायक शब्द त्नअदरवाइजत्न है। ये करदाताओं को सीधे शब्दों में बता रहा है कि इसके तहत टैक्स में छूट उन्हीं कर्मचरियों को मिलेगी जो रिटायरमेंट के अलावा किसी दूसरी वजह से नौकरी छोड़ते हैं और उन्हें छुट्टियों के बदले वेतन मिला हो। इस अनुच्छेद का इस्तेमाल 28 जुलाई 1997 को 142 सीटीआर 325 सीआईटी और डीपी मल्होत्रा के बीच चल रहे केस के फैसले में किया गया। मल्होत्रा ने नौकरी से इस्तीफा देने के बाद अनुच्छेद 10 (10एए) के तहत छुट्टियों के बदले मिलने वाले वेतन पर लगने वाले टैक्स में छूट का दावा किया था। इनकम टैक्स अफसर ने मल्होत्रा के दावे को खारिज कर दिया। उसके मुताबिक इस अनुच्छेद के तहत उन्हीं कर्मचारियों को फायदा मिल सकता है जिन्हें रिटायरमेंट के बाद त्नलीव सैलरीत्न मिली हो। उसके मुताबिक नौकरी के दौरान इस्तीफा देकर कंपनी छोड़ने वाले कर्मचारियों को इसका फायदा नहीं मिलता है।

रिटायरमेंट शब्द क्यों है अहम?
इनकम टैक्स कोर्ट के मुताबिक रिटायरमेंट शब्द का बहुत विस्तृत मतलब होता है। रोजगार के संबंध में इसका मतलब होता है करियर का निचोड़। हालांकि इस शब्द का एक अर्थ इस्तीफा भी होता है। कानून के शब्दकोष के मुताबिक इस्तीफे के एक मतलब रिटायरमेंट भी होता है। ज्यादातर शब्दकोषों के मुताबिक रिटायरमेंट और रेजिग्नेशन दोनों का ही मतलब नौकरी का निचोड़ है। इसका सीधा सा मतलब है कि नौकरी से इस्तीफा भी एक तरह का रिटायरमेंट ही है। एक बार जब कोई कर्मचारी इस्तीफा दे देता है तो उसे उस तारीख से नौकरी से हटा हुआ मान लिया जाता है जब कंपनी का कोई अधिकारी उसके इस्तीफे को मंजूर कर लेता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि कर्मचरी को इस्तीफा मंजूर होने के साथ ही रिटायर मान लिया जाता है।

क्या कहते हैं कोर्ट के फैसले?
कानून के मुताबिक अगर कोई कर्मचारी पेंशन पर रिटायर होता है तो रिटायरमेंट शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ आयकर अधिनियम के अनुच्छेद (10एए) की भाषा से साफ है कि रिटायरमेंट शब्द का विस्तृत इस्तेमाल किया जा सकता है। अनुच्छेद के मुताबिक चाहे कर्मचारी पेंशन पर रिटायर हुआ हो या किसी दूसरी वजह से रिटायर कहा जा सकता है। इससे साफ हो जाता है कि रिटायरमेंट होने पर चाहे वो इस्तीफे देने की वजह से हुआ हो, वो छुट्टियों के बदले मिलने वाले वेतन पर लगने वाले टैक्स में छूट का पात्र माना जाएगा। कुछ ऐसा ही फैसला मद्रास उच्च न्यायालय ने सीआई और आरजे शाहने के बीच चले केस में दिया था। कोर्ट ने कहा था कि रिटायरमेंट कई तरह का होता है। यह स्वैच्छिक और पेंशन पर दोनों तरह से हो कसता है। अगर किसी व्यक्ति ने स्वैच्छा सा रिटायरमेंट लिया है तो वह अनुच्छेद 10(10एए) के तहत लाभ लेने का हकदार माना जाएगा। -साथ में डीएनए

nit

Indian laws.

उपभोक्ता संरक्षण के नियम

भारत को शोषण रहित राष्ट्र बनाना प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है। भौतिकवाद युग में ऐसा करना कठिन तो है लेकिन असंभव नहीं। आज आवश्यकता ये है कि उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों और कर्त्तव्यों के प्रति सचेत किया जाए। जागरूक उपभोक्ता सफल उपभोक्ता होता है। वही शोषण मुक्त समाज की रचना कर सकता
है।

प्रत्येक व्यक्ति उपभोक्ता है। उसे अपने जीवन यापन के लिए सुख सुविधाओं की जरूरत है। वह वस्तुओं को खरीदता है या दाम दे कर किराए पर या सर्विस प्राप्त करता है। देश का नागरिक होने के नाते भी वह विशेष सुविधओं को प्राप्त करने का अधिकारी है। यदि उसके हितों की रक्षा न हो रही हो तो वह उपभोक्ता संरक्षण
अधिनियम के अधीन उसे प्राप्त कर सकता है। हर देश ने अपने उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए नियम बनाए है और विश्व भर में 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है।

भारत में सामाजिक अन्याय, आर्थिक विषमता अनैतिकता, भेदभाव और राजनीतिज्ञ अपराधीकरण जैसे कुरीतियों के समाधान के लिए पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए 24 दिसंबर 1986 को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम संसद में पास करवाया। इसी कारण प्रत्येक वर्ष 24 दिसंबर को राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस और 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है। 1986 के बाद 1991, 1993 और 2002 में इस अधिनियम में कुछ संशोधन किए गए।

अधिनियम के अनुसार इस समय जिला मंच में बीस लाख, राज्य आयोग में एक करोड़ तक और इससे अधिक राशि की क्षतिपूर्ति के लिए राष्ट्रीय आयोग का सहारा लिया जा सकता है। प्रत्येक उपभोक्ता को अपने कल्याण हेतु, समाज व राष्ट्र की स्थिरता अर्थव्यवस्था को सुढ़ और विकासशील बनाने के लिए अपने अधिकारी और

कर्त्तव्यों का ज्ञान होना अति आवश्यक है। अधिनियम की मुख्य विशेषताएं हैं :
1. यह सभी वस्तुओं और सेवाओं के लिए लागू होता है जब तक कि केन्द्र सरकार द्वारा विशेष छूट न दी जाए।

2. इसमें सभी क्षेत्र शामिल होते हैं चाहे वह निजी, सरकारी और सहकारी या कोई व्यक्ति हो अधिनियम के प्रावधान प्रतिपूरक तथा रोधी एवं दंडात्मक प्रकृति के है।

3. इसमें उपभोक्ताओं के लिए निम्नलिखित अधिकार अंतरनिहित हैं –

* ऐसे वस्तुओं और सेवाओं के विपरण के विरूद संरक्षण का अधिकार जो जान और माल के लिए खतरनाक है।

* वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता मात्रा, क्षमता, शुद्धता, स्तर और कीमत के बारे में सूचना का अधिकार ताकि छल कपट व्यापार प्रचलन से उपभोक्ताओं की रक्षा की जा सके।

* जहां कहीं भी संभव हो बीमित होने का अधिकार प्रति स्पर्धात्मक कीमत पर विभिन्नकिस्मों की वस्तुओं और सेवाओं की पहुंच।

* सुनवाई का अधिकार और वह आश्वासित होने का अधिकार कि उपभोक्ता के हितों पर उपभुक्त मंच पर विधिवत रूप से विचार किया जाएगा।

* कपटी व्यापार या उपभोक्ताओं के अविवेकपूर्ण शोषण के विरूद्ध समाधान का अधिकार और उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार।

अधिकारों के साथ-साथ कर्त्तव्यों का ज्ञान होना भी जरूरी :

1. वस्तु खरीदने से पहले उसकी गुणवत्ता और मूल्य की पूरी जानकारी।

2. झूठे और भ्रामक विज्ञापनों से सावधानी।

3. आईएसआई, एगमार्क और भरोसेमंद कंपनियों की वस्तुओं की खरीद।

4. खरीद की रसीद प्राप्ति। गारंटी-वारंटी कार्ड हो तो वह लेना न भूलें।

5. दोष पूर्ण वस्तु, अधिक मूल्य या त्रुटि पूर्ण सेवाओं के विरुद्ध जिला मंच, राज्य और राष्ट्रीय आयोग में शिकायत दर्ज करवाएं।

nit

Indian laws.

उम्रकैद का मतलब, जिदंगी भर के लिए जेल

उम्रकैद को लेकर गलतफहमी को दूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि आजीवन कारावास का मतलब यह है कि दोषी को ताउम्र जेल में रहना होगा।
न्यायालय ने यह भी कहा कि साल 1980 में इसकी संवैधानिक पीठ ने अपने फैसले में मौत की सजा दिए जाने की जो कसौटियां बताई थीं उन पर ‘फिर से विचार की जरूरत’ है क्योंकि जिन सिद्धांतों के आधार यह सजा सुनाई जा रही है उनमें ‘एकरूपता नहीं’ है।
शीर्ष न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, ‘हमें यह लगता है कि इस बाबत कुछ गलतफहमी है कि उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी को 14 साल या 20 साल की सजा पूरी हो जाने पर रिहा होने का पूरा अधिकार है। कैदी को ऐसा कोई अधिकार नहीं है।’
न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की पीठ ने कहा, ‘उम्रकैद की सजा काट रहे दोषी को उसकी जिंदगी खत्म होने तक हिरासत में रहना है। वह इससे पहले तभी रिहा किया जा सकता है जब सरकार की ओर से उसकी सजा में कोई छूट दी जाए।’
बहरहाल, पीठ ने स्पष्ट किया कि उम्रकैद की सजा काट रहे किसी कैदी को सजा में छूट देते वक्त सरकार सजा की अवधि 14 साल से कम नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, ‘उम्रकैद की सजा काट रहा कैदी अनिश्चित अवधि तक हिरासत में रहेगा। लिहाजा, यदि उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी को सजा में छूट दी जाती है तो इसे नियम नहीं मानना चाहिए क्योंकि हर मामले में ऐसा नहीं किया जा सकता और यह तथ्यों के आधार पर ही होता है।’
न्यायालय ने कहा, ‘ऐसे मामलों में सजा की अवधि कम करने के लिए सरकार कोसीआरपीसी की धारा 432 के तहत एक विशेष आदेश पारित करना होगा। हालांकि, सीआरपीसी की धारा 433-ए के तहत सजा की अवधि 14 साल से कम नहीं की जा सकती।’
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अब ‘त्योहारों’ या ‘विशेष अवसरों’ पर सरकारों की ओर से बड़ी तादाद में कैदियों की रिहाई के चलन पर भी रोक लगेगी। पीठ ने कहा कि एक-एक मामले की पड़ताल के बाद ही रिहाई होनी चाहिए।
शीर्ष न्यायालय ने यह भी कहा कि मौत की सजा दिए जाने के हालिया फैसलों के आधार में ‘एकरूपता’ की कमी देखी गई है और ये ज्यादा ‘न्यायाधीश-केंद्रित’ हो गए हैं।

nit

Indian laws.

चलचित्र कानून पर समिति ने रिपोर्ट सौंपी

नई दिल्‍ली। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मुकुल मुदगल की अध्यक्षता में गठित अधिकृत समिति ने चलचित्र अधिनियम पर गठित समिति की रिपोर्ट सूचना एवं प्रसारण राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) मनीष तिवारी को सौंप दी है। समिति का गठन चलचित्र अधिनियम, 1952 के तहत प्रमाणीकरण के मुद्दों पर विचार करने के लिए किया गया था। इसका गठन चार फरवरी 2013 को हुआ था।

प्रमुख मुद्दों पर विचार करने के बाद समिति ने सलाहकार मंडल, महिलाओं के चित्रण, अश्लीलता और सांप्रदायिक वैमनस्य जैसे मुद्दों के संबंध में दिशा-निर्देश, फिल्मों के वर्गीकरण, फिल्मों की पायरेसी, अपीलीय पंचाट की न्याय सीमा तथा चलचित्र अधिनियम 1952 के प्रावधानों की समीक्षा पर अपनी सिफारिशें दी हैं। उल्लेखनीय है कि अपने आठ महीने के कार्यकाल के दौरान समिति ने विभिन्न हितधारकों के साथ चेन्नई, दिल्ली, मुंबई और कोलकाता में कई बैठकें आयोजित कीं।

मुकुल मुदगल के अलावा पूर्व सूचना एवं प्रसारण सचिव उदय कुमार वर्मा, एफसीएटी के अध्यक्ष ललित भसीन, सीबीएफसी की पूर्व अध्यक्ष शर्मिला टैगौर, गीतकार जावेद अख्तर, सीबीएफसी की अध्यक्ष लीला सैमसन, भारतीय चलचित्र परिसंघ के पूर्व अध्यक्ष और दक्षिण भारतीय चलचित्र वाणिज्य परिसंघ के सचिव एल सुरेश, उच्चतम न्यायालय की अधिवक्ता रमीजा हाकिम और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव (चलचित्र) राघवेंद्र सिंह समिति के सदस्य हैं।

nit

Indian laws.

मिलावटी दूध पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती कितनी कारगर?

जस्टिस केएस राधाकृष्णन और ए.के. सीकरी की बेंच ने कहा कि दूध में मिलावटखोरी रोकने के लिए मौजूदा कानूनी व्यवस्था नाकाफी है। बेंच इस मामले में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस दौरान उत्तर प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने अपना जवाब दाखिल किया। इसमें कहा कि उन्होंने पहले से ही ऐसे अपराधों के लिए उम्र कैद की सजा वाले कानून बना रखे हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि बाकी रायों को भी ऐसा करना चाहिए। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने देश में कृत्रिम और मिलावटी दूध के बड़े कारोबार का भंडाफोड़ किया था। प्राधिकरण ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश में 68.4 फीसदी दूध मिलावटी बिकता है।

दूध में मिलावट पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने कहा है कि जो कोई भी दूध में मिलावट करता है या उसका कारोबार करता है, उसे उम्र कैद की सजा होनी चाहिए। पर मौजूदा कानून में इतनी सख्त सजा का प्रावधान ही नहीं है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी है कि राय सरकारें कानून बदलें। दूध में मिलावट करने वालों को उम्र कैद की सजा का प्रावधान करे। अभी मिलावट के मामलों में फूड सेफ्टी एंड स्टेंडर्ड एक्ट के तहत कार्रवाई होती है। इस कानून के तहत दोषी को अधिकतम छह माह की सजा हो सकती है। कोर्ट ने इस पर ऐतराज जताया है। जस्टिस केएस राधाकृष्णन और ए.के. सीकरी की बेंच ने कहा कि दूध में मिलावटखोरी रोकने के लिए मौजूदा कानूनी व्यवस्था नाकाफी है। बेंच इस मामले में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस दौरान उत्तर प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने अपना जवाब दाखिल किया। इसमें कहा कि उन्होंने पहले से ही ऐसे अपराधों के लिए उम्र कैद की सजा वाले कानून बना रखे हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि बाकी रायों को भी ऐसा करना चाहिए। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने देश में कृत्रिम और मिलावटी दूध के बड़े कारोबार का भंडाफोड़ किया था। प्राधिकरण ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश में 68.4 फीसदी दूध मिलावटी बिकता है।दूध हमारे जीवन का एक आवश्यक पेय पदार्थ है। दूध की महिमा अपरंपार है। दूध का मोल कभी चुकाया नहीं जा सकता, इस उक्ति के पीछे दूध में समाहित वे भाव हैं, जिससे माँ के माध्यम से शिशु तक पहुँचता है। जन्म के कुछ समय तक तो माँ का यही दूध उसके लिए अमृततुल्य होता है। लेकिन मिलावट की इस दुनिया में अब कुछ भी शुध्द नहीं है, यहाँ तक माँ का दूध भी। आज वह भी मिलावट का शिकार हो गया है। कुछ देशों में मिलावट के कानून इतने सख्त हैं कि वहाँ मिलावट नहीं होती, पर हमारे देश में अभी तक मिलावट के नाम पर किसी को कोई बड़ी सजा दी गई हो, ऐसा सुनने में नहीं आया। दूध को दवा मानने वालों को कैसे समझाया जाए कि आज दवाओं में भी मिलावट जारी है और हमारे देश में सब चलता है, के कारण कुछ खास नहीं हो पाता। दूध एक संपूर्ण आहार ही नहीं, दवा भी है। विश्व में माता का दूध सर्वश्रेष्ठ साबित हो चुका है। दूध पीने से अनेक रोगों का नाश होता है। दूध में पानी, खनिज तत्व, वसा, प्रोटीन, शर्करा आदि पदार्थो का समावेश होता है, जो शरीर के लिए अति आवश्यक है। किंतु आज मिलावटी दूध बाजार में उपलब्ध है। इसके सेवन से स्त्रियों को स्तन और गर्भाशय का केन्सर होने की संभावना बढ़ जाती है। छोटे बच्चों को यदि ये मिलावटी दूध नियमित रूप से दिया जाए, तो इसके सेवन से युवावस्था तक आते-आते ये अनेक रोगों के शिकार हो सकते हैं। ये सारी बातें यदा-कदा अखबार या अन्य पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हमारे मस्तिष्क में बैठती है, किंतु इसके बाद भी आज की आधुनिक मम्मियाँ अपने फिगर मेन्टेन की चाहत में बच्चों को स्तनपान कराने से दूर रहती हैं। शारीरिक सौंदर्य की चिंता में लगभग 94 प्रतिशत माताएँ संतान को डिब्बाबंधा दूध देकर बीमारियों को आमंत्रित कर रही हैं।   एक समय था, जब हमारे देश में दूध की नदियाँ बहती थीं। इसके विपरीत वह समय जल्द ही आने वाला है, जब हम अपनी सुबह की शुरुआत विदेशी दूध की चाय पीकर करेंगे, क्योंकि मल्टीनेशनल कंपनियाँ अपनी गुणवत्तायुक्त और एकदम नई पेकिंग के साथ दूध का व्यापार करने के लिए हमारे देश में प्रवेश कर चुकी हैं। दक्षिण भारत में इनका दूध का व्यापार शुरू हो चुका है। विदेशी कंपनियाँ भी अपने लाभ की ओर धयान देते हुए पूरी तैयारी के साथ बाजार में कदम रख रही हैं। इस व्यापार के पीछे की हकीकत देखी जाए, तो मिलावटी दूध की बात सामने आती है। आज पेकिंग दूध में मिलावट की दृष्टि से ही चिकित्सक रोगी को इसे न पीने की सलाह देते हैं। दूध में पानी से लेकर जंतुनाशक, डी.डी.टी., सफेद रंग, हाइड्रोजन पैराक्साइड आदि मिलाकर सिन्थेटिक दूध बनाया जाता है। देश में प्रतिदिन लगभग 1 करोड़ लीटर से अधिक दूध की बिी होती है। किंतु मिलावटी दूध के कारण अब तो दूध को संपूर्ण आहार कहना भी गलत होगा। आज मिलावटी दूध के सेवन से लोग अनेक रोगों का शिकार हो रहे हैं। माँ के दूध में 87.7 प्रतिशत पानी, 3.6 प्रतिशत वसा, 6.8 प्रतिशत शर्करा, 1.8 प्रतिशत प्रोटीन, 0.1 प्रतिशत खनिज तत्व होते हैं। भैंस के दूध में 84.2 प्रतिशत पानी, 6.6 प्रतिशत वसा, 5.2 प्रतिशत शर्करा, 3.9 प्रतिशत प्रोटीन और 0.8 प्रतिशत अन्य खनिज पदार्थ उपलब्ध होते हैं। गाय के दूध में 84.2 प्रतिशत पानी, 6.6 प्रतिशत वसा, 5.2 प्रतिशत शर्करा, 3.9 प्रतिशत प्रोटीन, 0.7 प्रतिशत खनिज तत्व होते हैं। बकरी के दूध में 86.5 प्रतिशत पानी, 4.5 प्रतिशत वसा, 4.7 प्रतिशत शर्करा, 3.5 प्रतिशत प्रोटीन, 0.8 र्प्रतिशत खनिज तत्व, भेड़ के दूध में 83.57 प्रतिशत पानी, 6.18 प्रतिशत वसा, 4.17 प्रतिशत शर्करा, 5.15 प्रतिशत प्रोटीन और 0.93 प्रतिशत खनिज तत्व होते हैं। अतरू हम कह सकते हैं कि संसार में माता का दूध सर्वश्रेष्ठ है।   दूध एक उत्तम आहार होने के बाद भी आज केवल मिलावट के कारण ये संदेह के घेरे में है। दूध की शुधदता पर लगे प्रश्न चिह्न से उसकी गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है।

दिल्ली के आसपास के क्षेत्र में दूध के पंद्रह नमूने लिए गए और जब उस पर शोध किया गया, तो पता चला कि उसमें 0.22 से 0.166 माइोग्राम जितना डी.डी.टी. था। पंजाब में दूध में डी.डी.टी. होने का प्रमाण अन्य रायों की तुलना में 4 से 12 गुना अधिक है। यदि ऐसा दूध स्त्रियाँ सेवन करें, तो उनमें स्तन केन्सर या गर्भाशय का केन्सर होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। दूध पावडर में भी डी.डी.टी. का प्रमाण अधिक होने के कारण यह छोटे बच्चों के लिए भी हानिकारक है।   आज लाइफ स्टाइल में आने वाले बदलाव के कारण पेकिंग वाले दूध की माँग लगातार बढ़ती जा रही है। साथ ही दूध पावडर की मांग भी बढ़ रही है। वसायुक्त एवं वसारहित दूध दोनों का ही विय अधिक होता है। इससे आगे बढ़कर कंपनियों द्वारा खास ऐसी पेकिंग की जा रही है, जिसमें दूध लगभग तीन महीने तक खराब नहीं होता। प्लास्टिक की पेकिंग वाला दूध अच्छा होता है और अधिक समय तक खराब नहीं होता, ऐसा भी लोग मानने लगे हैं। आंध्रप्रदेश की एक दुग्ध डेयरी ने तो 6 माह तक खराब न होने वाले दूध को बाजार में लाने की तैयारी कर ली है। ग्राहक तो केवल पूर्ण विश्वास के साथ दूध की डेयरी और ब्रान्ड का नाम पढ़कर दूध खरीदते हैं। भारत में डेयरी प्रोजेक्ट का बाजार वर्ष में 36000 करोड़ का है। दूध की लगातार बढ़ती जा रही माँग के कारण ही ताजा दूध मिलना तो अब संभव ही नहीं है। सभी दुधारू पशुपालक अपने पशुओं का दूध डेयरी में बेच देते हैं। यहाँ तक कि बीमार पशु का दूध भी आय को धयान में रखते हुए डेयरी में पहुँचा दिया जाता है। सोने पे सुहागा यह कि कई पशुपालक तो अपने पशुओं को अधिक दूध के लिए इंजेक्शन देकर दूध का व्यापार करने से भी नहीं चूकते। ऐसा दूध स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है, इस दिशा में उन्हें सोचने की फुरसत ही नहीं है। दूध का व्यापार करने वाले इन स्वार्थी लोगों ने तो दूध का मूल रंग ही बदल दिया है। आज दूध सफेद नहीं, अनेक रंगों में उपलब्ध है। साथ ही विविधा फ्लेवर में भी बाजार में उपलब्धा है। 10 रुपए में मात्र 200 ग्राम दूध ग्राहक को देकर आज खूब कमाई की जा रही है। अमेरिका, दुबई, सिंगापुर सहित कई देशों में मिलावट को लेकर बनाए गए नियम काफी सख्त होने के कारण वहाँ पर खास मिलावट नहीं होती, पर हमारे देश में तो सब चलता है, की तर्ज पर खूब मिलावट होती है। नियम है, पर वे सभी ताक पर रखे हुए हैं। इसी का फायदा उठाकर व्यापारी वर्ग पूरे मुनाफे के साथ अपना व्यापार फैलाता जा रहा है।

nit

Indian laws.

एक नजर में : हिन्दू विवाह अधिनियम

हि न्दू विवाह अधिनियम 1955 उन सभी लोगों पर लागू होता है, जो धर्मत: हिन्दू, जैन, बौध्द और सिख हों। या वह सभी व्यक्ति जो हिन्दू विधि से संचालित होते हैं। हिन्दू उसे माना जाता है, जिसके माता-पिता दोनों ही एक धर्मत: हिन्दू, बौध्द, जैन या सिक्ख हों। धर्म परिवर्तन करके हिन्दू बनने वाले व्यक्ति पर भी यह अधिनियम लागू होता है।
अन्य शहरों की स्थिति

दिल्ली महिला आयोग के आंकड़ों के अनुसार इस महानगर में हर साल करीब 1 लाख 30 हजार शादियां होती हैं और दस हजार तलाक होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में तलाक लेने वालों की संख्या दोगुनी हो गई है। इस बात का अंदाजा सिर्फ इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि दिल्ली की विभिन्न पारिवारिक अदालतों में हर वर्ष दस हजार से अधिक तलाक की अर्जियां डाली जाती हैं। आंकड़ों के मुताबिक, मुम्बई में 4000 और बंगलुरू में 5000 अर्जियां दाखिल की जाती हैं। यहां तक की देश के सबसे शिक्षित प्रदेश केरल में भी पिछले दस वर्षों में तलाक के मामलों में 350 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। पंजाब व हरियाणा में पिछले एक दशक में 150 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। वहीं अगर पारिवारिक अदालतों के न्यायाधीशों की बात करें तो 1960 में न्यायाधीशों के पास एक से दो मामले आते थे। 1980 में यह बढ़कर 100 से 200 तक हो गया, 1990 में यह आंकड़ा 1000 तक पहुंच गया। अब यह बढ़कर 9000 तक पहुंच गया है।

तलाक के 9 आधार
व्यभिचार
क्रूरता
परित्याग
धर्म परिवर्तन
पागल
कुष्ठ रोग
छूत की बीमारी वाले यौन रोग
संन्यास
सात साल से जीवित होने की खबर न हो

विधि आयोग की सिफारिशें
अप्रैल, 1978 विधि आयोग की 71वीं रिपोर्ट में कहा गया कि ‘इरिट्रिवेएबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज’ यानी शादी के टूट चुके रिश्ते के दोबारा जुड़ने की संभावना न होना भी तलाक का एक आधार माना जाए।
कानून में संशोधन कर हिन्दू मैरिज एक्ट में धारा 13 सी जोड़ने की सिफारिश की गई। मार्च 2009 विधि आयोग की 217वीं रिपोर्ट में भी ‘इरिट्रिवेएबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज’ को तलाक का आधार बनाए जाने की सिफारिश की गई।
सुप्रीमकोर्ट के अहम फैसले
जॉर्डन डाइंगडेह बनाम एसएस चोपड़ा
नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली
समर घोष बनाम जया घोष

nit

Indian laws.

लॉटरी के नियम के लिए पर्याप्त कानून

सरकार ने कहा कि लॉटरी के नियमन के लिए बने कानून के प्रावधान पर्याप्त पाए गए हैं और किसी भी राज्य सरकार ने केंद्रीय लॉटरी कानून में संशोधन करने के लिए संपर्क नहीं किया है।

गृह राज्य मंत्री अजय माकन ने कहा कि किसी भी राज्य सरकार ने केंद्रीय लॉटरी कानून में संशोधन करने के लिए केंद्र सरकार से संपर्क नहीं किया है।

उन्होंने कहा कि लॉटरी (विनिमय) अधिनियम 1998 के प्रावधानों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ राज्य सरकारें कार्रवाई कर सकती हैं। बहरहाल, उच्चतम न्यायालय ने मेसर्स बीआर एंटरप्राइजेस बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य के मामले में कहा है कि राज्य सरकार इस तरह के अधिकार का इस्तेमाल तभी कर सकती है जब उसने अपने क्षेत्र में लॉटरी नहीं चलाने का फैसला किया हो।

माकन ने पीजे कुरियन के सवाल के लिखित जवाब में राज्यसभा को बताया कि अगर दो राज्यों के बीच लॉटरी चलाने को लेकर विवाद हों और वे आपस में विवाद का हल नहीं निकाल पा रहे हों तो कानून के तहत यह प्रावधान है कि तथ्यों को केंद्र सरकार के प्रकाश में लाया जा सकता है।(भाषा)

nit

Indian laws

प्रश्न इच्छामृत्यु की वैधता का

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के अन्तर्गत मिले जीवन के अधिकार में किसी व्यक्ति की प्राकृतिक अथवा  स्वाभाविक आयु को घटाने या खत्म करने का अधिकार नहीं आता। आईपीसी की धारा 309 के अन्तर्गत आत्महत्या को अपराध माना गया है। इसलिए कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से जीवन को खत्म करने का अधिकारी नहीं है। इतना ही नहीं, यदि कोई अन्य व्यक्ति किसी पीडित व्यक्ति के कष्ट को समाप्त करने के लिए ही सही, दया मृत्यु की मांग करता है, तो उस पर आईपीसी की धारा 304 के तहत हत्या का मामला चलाया जा सकता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे देश के कानून में न तो इच्छामृत्यु और न ही दया मृत्यु की इजाजत दी गई है। सम्भवत: इस मनाही को कानून के मानवीय स्वरूप से जोड़ा गया है। विषय से जुडे प्रश्न के विश्लेषण के लिए यहां सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय का उल्लेख आवश्यक है,जो मार्च 2011 में अरूणा रामचन्द्रन शानबाग के प्रकरण में सुनाया गया था। इस निर्णय में यह कहकर कि वर्तमान में देश में इच्छामृत्यु पर कोई कानून नहीं है, दयामृत्यु की याचिका को खारिज कर दिया था। वस्तुत: इच्छामृत्यु अत्यन्त संवेदनशील मुद्दा है तथा इसे वैध घोषित करने से पहले इसके विविध पहलुओं पर गौर करना आवश्यक है।
इस प्रश्न के दो पहलू हैं। इच्छामृत्यु से असहमति जताने वालों का कहना है कि भारत में सेवा भाव की प्रधानता रही है। अत: मरणासन्न व्यक्ति की अन्तिम सांस तक सेवा करनी चाहिए, भले ही वह कितनी भी कष्टप्रद स्थिति में क्यों न हो। किसी हद तक यह तर्क उचित भी है, किन्तु यहां उस व्यक्ति की मर्जी का विशेष महत्व है कि मौत उसे बेहतर विकल्प तो नहीं लग रही है। जिन्दगी जब ऐसा बोझ बन जाए कि उसे उठा पाना मुमकिन न हो तो इस दशा में रोगी के कष्ट को देखते हुए इच्छामृत्यु की अनुमति दिए जाने में बुराई नहीं है। सुविधाओं के अभाव में भी इसकी अनुमति दी जा सकती है। इच्छामृत्यु के पक्षधारों का मानना है कि प्राण और चेतना पर व्यक्ति के अधिकार को वरीयता दी जानी चाहिए। इच्छामृत्यु को अनुचित बताने वालों का यह मानना है कि यह कृत्य नैसर्गिक व्यवस्था के प्रतिकूल है। वे इसे ईश्वरीय सत्ता से जोड़ कर देखते हैं और यह मानते हैं कि जीवन ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक सुन्दर सौगात है। ईश्वर ही जीवन देता है और उसे ही इसे समाप्त करने का अधिकार है। अत: सब कुछ ईश्वरीय सत्ता पर छोड़ देना ही श्रेयस्कर है। यह ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जिस पर आम सहमति बन पाना बहुत मुश्किल है। ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर जल्दबाजी में कोई भी निर्णय नहीं लिया जा सकता, क्योंकि इसे वैध ठहराकर कानून निर्मित करने की स्थिति में इसके दुरूपयोग की सम्भावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि न केवल भारत में, बल्कि विश्व के अनेक विकसित एवं विकासशील देशों में इसकी वैधता को लेकर बहस छिड़ी हुई है। जैसा कि पहले ही इंगित किया जा चुका है कि संवैधानिक दर्जा मिलने की दशा में इसके व्यापक दुरूपयोग की सम्भावना है। ऐसा ऑस्ट्रेलिया में हो भी चुका है। आस्ट्रेलिया ही वह देश है जहां सबसे पहले वर्ष 1995 में इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता प्रदान की गई।
 1996 में वहां इच्छामृत्यु के कानून को लागू किया गया। देखते ही देखते वहां इच्छामृत्यु की बाढ़ सी आ गई। आए दिन  इसके दुरूपयोग के मामले सामने आने लगे, जिन्हें देखते हुए वहां की सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े। 25 मार्च 1997 को आस्ट्रेलिया में यह कानून समाप्त कर दिया गया। कहने का आशय यह है कि इच्छामृत्यु को कुछ विशेष दशाओं में वैधानिक दर्जा तो दिया जा सकता है, किन्तु इसके लिए फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है ताकि इसके दुरूपयोग की सम्भावनाएं न रहें। भारत जैसे देश में ,जहां भ्रष्टाचार और अराजकता के साथ पारिवारिक विघटन और बुजुर्गों की उपेक्षा का चलन बढा है वहां तो और भी अधिक सतर्कता बरती जानी चाहिए। विशेष परिस्थितियों में इच्छामृत्यु को संवैधानिक दर्जा देने से पूर्व यह नितान्त आवश्यक है कि इस विवादास्पद मुद्दे पर संसद में एक परिचर्चा कराई जाए और उससे मिलने वाले रूझानों को देखते हुए अन्तिम एवं स्थाई व्यवस्था का निर्धारण किया जाये।
ऐसा करते समय कानूनी, सामाजिक, नैतिक एवं मानवीय सभी पहलुओं को ध्यान में रखा जाए। ऐसे उपाय भी सुनिश्चित किए जाए ताकि इसके दुरूपयोग की गुंजाइश न रहे। हमारे देश में वृध्दों की स्थिति पहले से ही चिन्तनीय है। भ्रष्ट व्यवस्था ने सारे पैमाने ध्वस्त कर दिए है। सगे सम्बन्धियों द्वारा वृध्दों की सम्पत्ति हड़पने के मामले रोज सामने आ रहे है। ऐसे में पूरी पूरी सम्भावना इसके दुरूपयोग की है। वैधानिक स्थिति को हथियार बनाकर यदि इसका दुरूपयोग किया जाने लगा तो स्थिति अत्यन्त भयावह, विकराल  और अराजक हो जाएगी। दुष्परिणाम सामने आयेंगे और कानून व्यवस्था को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। अत: इस दिशा में सुचिंतित पहल की जरूरत है। इच्छा-मृत्यु के सामाजिक निहितार्थ तो, खासकर तीसरी दुनिया के गरीब लोगों के लिए, और भी अधिक भयावह है। तीसरी दुनिया में जहां स्वास्थ्य सेवाएं आम आदमी के बस से बाहर हो चुकी हैं, जहां व्यक्ति के लिए रोटी-कपड़ा-मकान हासिल करना मुहाल है, वहां यदि इच्छा-मृत्यु को कानूनी रूप दे दिया जाए तो असहाय एवं गंभीर रोगियों की इच्छा-मृत्यु के नाम पर हत्याओं की बाढ़ आ सकती है। पूंजीवादी समाज में जहां मानवीय सरोकार दिनों-दिन समाप्त होते जा रहे हैं, वहां पर इच्छा-मृत्यु के नाम पर लाखों मरणासन्न लोगों को अनइच्छित मौत की तरफ धाकेला जा सकता है। अत: गिरते मानवीय सरोकारों एवं सामाजिक जीवन में पसरती जा रही अनैतिकता को देखते हुए ऐसे किसी भी फैसले के भयावह पहलुओं का भी आकलन करना जरूरी है।

nit

Indian laws.

हिंदी भाषा का उच्चतम न्यायालय में प्रयोग!

नई दिल्ली। संविधान के रक्षक उच्चतम न्यायालय का राष्ट्र भाषा हिंदी में कार्य करना अपने आप में गौरव और हिंदी को प्रोत्साहन का विषय है। राजभाषा पर संसदीय समिति ने 28 नवंबर 1958 को संस्तुति की थी कि उच्चतम न्यायालय में कार्यवाहियों की भाषा हिंदी होनी चाहिए। इस संस्तुति को पर्याप्त समय व्यतीत हो गया है, किंतु इस दिशा में आगे कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में अंग्रेजी भाषी लोग मात्र 0.021% ही हैं। इस दृष्टिकोण से भी अत्यंत अल्पमत की, और विदेशी भाषा जनता पर थोपना जनतंत्र का स्पष्ट निरादर है। देश की राजनैतिक स्वतंत्रता के 65 वर्ष बाद भी देश के सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाहियां अनिवार्य रूप से ऐसी भाषा में संपन्न की जा रही हैं, जो 1% से भी कम लोगों में बोली जाती है। इस कारण देश के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से अधिकांश जनता में अनभिज्ञता व गोपनीयता, और पारदर्शिता का अभाव रहता है। अब संसद में समस्त कानून हिंदी भाषा में बनाये जा रहे हैं और पुराने कानूनों का भी हिंदी अनुवाद किया जा रहा है अतः उच्चतम न्यायालय को हिंदी भाषा में कार्य करने में कोई कठिनाई नहीं है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण आयोग, विधि आयोग आदि भारत सरकार के मंत्रालयों, विभागों के नियंत्रण में कार्यरत कार्यालय हैं और वे राजभाषा अधिनियम के प्रावधानों के अनुसरण में हिंदी भाषा में कार्य करने को बाध्य हैं तथा उनमें उच्चतम न्यायालय के सेवा निवृत न्यायाधीश कार्यरत हैं। यदि एक न्यायाधीश सेवानिवृति के पश्चात हिंदी भाषा में कार्य करने वाले संगठन में कार्य करना स्वीकार करता है, तो उसे अपने पूर्व पद पर भी हिंदी भाषा में कार्य करने में स्वाभाविक रूप से कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। दिल्ली उच्च न्यायालय में 11 अनुवादक पदस्थापित हैं, जो आवश्यकतानुसार अनुवाद कार्य कर न्यायाधीशों के न्यायिक कार्यों में सहायता करते हैं। उच्चतम न्यायालय में भी हिंदी भाषा के प्रयोग को सुकर बनाने के लिए न्यायाधीशों को अनुवादक सेवाएं उपलब्ध करवाई जा सकती हैं।

आज केंद्र सरकार के अधीन कार्यरत ट्राइब्यूनल तो हिंदी भाषा में निर्णय देने के लिए कर्तव्यरूप से बाध्य हैं। अन्य समस्त भारतीय सेवाओं के अधिकारी हिंदी भाषी राज्यों में सेवारत होते हुए हिंदी भाषा में कार्य कर ही रहे हैं। राजस्थान उच्च न्यायालय की तो प्राधिकृत भाषा हिंदी ही है और हिंदी से भिन्न भाषा में कार्यवाही केवल उन्ही न्यायाधीश के लिए अनुमत है, जो हिंदी भाषा नहीं जानते हों। क्रमशः बिहार और उत्तरप्रदेश उच्च न्यायालयों में भी हिंदी भाषा में कार्य होता है। न्यायालय जनता की सेवा के लिए बनाये जाते हैं और उन्हें जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरना चाहिए। हिंदी भाषा को उच्चतम न्यायालय में कठोर रूप से लागू करने की आवश्यकता ही नहीं है, अपितु वैकल्पिक रूप से इसकी अनुमति दी जा सकती है और कालांतर में हिंदी भाषा का समानांतर प्रयोग किया जा सकता है। आखिर हमें स्वदेशी भाषा हिंदी लागू करने के लिए कोई लक्ष्मण रेखा खेंचनी होगी-शुभ शुरुआत जो करनी है।
अब देश में हिंदी भाषा में कार्य करने में सक्षम न्यायविदों और साहित्य की भी कोई कमी नहीं है। न्यायाधीश बनने के इच्छुक, जिस प्रकार कानून सीखते हैं, ठीक उसी प्रकार हिंदी भाषा भी सीख सकते हैं, चूंकि किसी न्यायाधीश को हिंदी नहीं आती, अत: न्यायालय की भाषा हिंदी नहीं रखी जाए, तर्कसंगत व औचित्यपूर्ण नहीं है। इससे यह संकेत मिलता है कि न्यायालय न्यायाधीशों और वकीलों की सुविधा के लिए बनाये जाते हैं। देश के विभिन्न न्यायालयों से ही उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश आते हैं। देश के कुल 18008 अधीनस्थ न्यायालयों में से 7165 न्यायालयों की भाषा हिंदी हैं और शेष न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी अथवा स्थानीय भाषा है। इन अधीनस्थ न्यायालयों में भी कई न्यायालयों की कार्य की भाषा अंग्रेजी है, जबकि अभियोजन की प्रस्तुति हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में की जा रही है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, केरल, तमिलनाडु आदि इसके उदाहरण हैं। इस प्रकार कई राज्यों में अधीनस्थ न्यायालयों, उच्च न्यायालय में अभियोजन की भाषाएं भिन्न-भिन्न हैं, किंतु उच्च न्यायालय अपनी भाषा में सहज रूप से कार्य कर रहे हैं।

संसदीय राजभाषा समिति की संस्तुति संख्या 44 को स्वीकार करने वाले राष्ट्रपति के आदेश को प्रसारित करते हुए राजभाषा विभाग के (राजपत्र में प्रकाशित) पत्रांक I/20012/07/2005-रा.भा.(नीति-1) दिनांक 02.07.2008 में कहा गया है-“जब भी कोई मंत्रालय विभाग या उसका कोई कार्यालय या उपक्रम अपनी वेबसाइट तैयार करे तो उसे अनिवार्य रूप से द्विभाषी तैयार किया जाए। जिस कार्यालय की वेबसाइट केवल अंग्रेजी में है, उसे द्विभाषी बनाए जाने की कार्यवाही की जाए।”  फिर भी राजभाषा को लागू करने में कोई कठिनाई आती है तो केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो अथवा आउटसोर्सिंग से इस प्रसंग में सहायता भी ली जा सकती है।

संसदीय राजभाषा समिति की रिपोर्ट खंड-5 में की गयी संस्तुतियों को राष्ट्रपति की पर्याप्त समय से पहले, राज-पत्र में प्रकाशित पत्रांक I/20012/4/92-रा.भा.(नीति-1) दिनांक 24.11.1998 से ही स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। संस्तुति संख्या (12)-उच्चतम न्यायलय के महा-रजिस्ट्रार के कार्यालय को अपने प्रशासनिक कार्यों में संघ सरकार की राजभाषा नीति का अनुपालन करना चाहिए। वहां हिंदी में कार्य करने के लिए आधारभूत संरचना स्थापित की जानी चाहिए और इस प्रयोजन के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रोत्साहन दिए जाने चाहिएं। संस्तुति संख्या (13)-उच्चतम न्यायालय में अंग्रेजी के साथ–साथ हिंदी का प्रयोग प्राधिकृत होना चाहिए। प्रत्येक निर्णय दोनों भाषाओं में उपलब्ध हों। उच्चतम न्यायालय द्वारा हिंदी और अंग्रेजी में निर्णय दिया जा सकता है, अत: अब कानूनी रूप से भी उच्चतम न्यायालय में हिंदी भाषा के प्रयोग में कोई बाधा शेष नहीं रह गयी है।

संविधान के अनुच्छेद 348 में यह प्रावधान है कि जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी। उच्च न्यायालयों में हिंदी भाषा के प्रयोग का प्रावधान दिनांक 07-03-1970 से किया जा चुका है और वे राजभाषा अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत अपनी कार्यवाहियां हिंदी भाषा में स्वेच्छापूर्वक कर रहे हैं। ठीक इसी के समानांतर राजभाषा अधिनियम में निम्नानुसार धारा 7क अन्तःस्थापित कर संविधान के रक्षक उच्चतम न्यायालय में भी हिंदी भाषा के वैकल्पिक उपयोग का मार्ग प्रक्रियात्मक रूप से खोला जा सकता है।

धारा 7 क. उच्चतम न्यायालय के निर्णयों आदि में हिंदी का वैकल्पिक प्रयोग-“नियत दिन से ही या तत्पश्चात्‌ किसी भी दिन से राष्ट्रपति की पूर्व सम्मति से, अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का प्रयोग, उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित या दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के प्रयोजनों के लिए प्राधिकृत कर सकेगा और जहां कोई निर्णय, डिक्री या आदेश हिंदी भाषा में पारित किया या दिया जाता है, वहां उसके साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के प्राधिकार से निकाला गया अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद भी होगा।” इस हेतु संविधान में किसी संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं है। हिंदी के वैकल्पिक उपयोग के प्रावधान से न्यायालय की कार्यवाहियों में कोई व्यवधान या हस्तक्षेप नहीं होगा, अपितु राष्ट्र भाषा के प्रसार के एक नए अध्याय का शुभारंभ हो सकेगा।

nit